बोध

निवारण — पहला मार्ग

बोध

जब दिख जाए तो बात खत्म

कहानियों को बनने में हज़ारों साल लगे। बोध एक पल में घटित हो सकता है। किसी मज़ाक की तरह। किसी चमक की तरह। जो था — वह नहीं रहता। जो नहीं था — वह दिख जाता है।

एक पल होता है।

बस एक पल। जिसमें सब कुछ पलट जाता है।

कोई सीढ़ी नहीं। कोई अभ्यास नहीं। कोई धीरे-धीरे नहीं। एक पल पहले — सब कुछ असली था। एक पल बाद — वह असली नहीं रहा।

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कल्पना करो — कुछ दोस्त मिलकर एक दोस्त को मूर्ख बना रहे हैं। उसे बताया जाता है कि उसका चयन नहीं हुआ। वह टूट जाता है। आँखें भर आती हैं। भीतर कुछ बिखरता है। दर्द असली है — शरीर में, साँसों में, सीने में।

और फिर — दोस्त सूची दिखाते हैं। उसका नाम सबसे ऊपर है।

उस एक पल में — वह दूसरा इंसान हो जाता है। वही शरीर। वही कमरा। वही हवा। लेकिन भीतर सब उलट गया।

क्या बदला?

बोध हुआ।

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बोध ऐसे ही होता है।

पहले मन दौड़ता है — यह कहानी है। वह कहानी है। यह भी बनाया हुआ है। वह भी। और फिर अचानक — एक चमक।

सिर्फ यह नहीं कि यह कहानी है और वह कहानी है।

बल्कि — सब कुछ कहानी है।

मैं भी। मेरी पहचान भी। मेरा नाम भी। मेरी महत्वाकांक्षा भी। मेरा दुख भी। मेरी खुशी भी।

जो "मैं" इन सबको महसूस कर रहा था — वह भी एक कहानी थी।

कहानियाँ ही कहानियाँ। और उन कहानियों को ओढ़े हुए — मैं।

यह समझ में नहीं आती। यह दिखती है। और जब दिखती है — तो फिर अनदेखी नहीं होती।

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उसके बाद जीवन बदल जाता है।

वही पड़ोसी — जो ईर्ष्या में जीता है — अब दयनीय लगता है। वही बॉस — जो गुस्से में जलता है — अब बेचारा लगता है। वह प्रेरणा से भरा सभागार — जहाँ लोग जोश में उछलते हैं — अब हँसाता है। वह दोस्त — जो बन-सँवर कर रहने की नसीहत देता है — अब बेजान लगता है।

कोई निर्णय नहीं है इनमें। कोई घमंड नहीं। कोई श्रेष्ठता नहीं।

बस — जो दिख गया, वह दिख गया।

जीवन उस चलचित्र की तरह हो जाता है जिसमें आनंद तो बहुत है — लेकिन जिसका असर नहीं होता। पर्दा उठता है। पर्दा गिरता है। तुम बाहर निकलते हो — और वही होते हो जो थे।

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बोध के बाद दो दुनिया हो जाती हैं।

एक वह — जो अपनी कहानी की किताब जला चुका है।

दूसरे वे — जो अभी उसी किताब में उलझे हैं।

जो किताब जला चुका है — वह किसी को नहीं बता सकता। बताना भी एक कहानी बन जाएगी। वह सिर्फ देख सकता है। और देखता रहता है।

जो अभी उलझा है — उसे बताया भी नहीं जा सकता। बोध बताया नहीं जाता। बोध होता है।

जो कह रहा है कि सब काल्पनिक है — वह बोध में है।

जिसे यह कहा जा रहा है — वह अभी नहीं है।

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जो बोध में है — उसे जन्मदिन का इंतज़ार नहीं होता।

इसलिए नहीं कि वह उदास है। इसलिए नहीं कि उसे कोई याद नहीं करता। बल्कि इसलिए कि वह अभी — इसी पल — रस में है। जन्मदिन की कहानी उसकी ज़रूरत नहीं है। जो पल में जी रहा है — उसे किसी विशेष पल की प्रतीक्षा नहीं होती।

जो बोध में है — वह किसी ईश्वर के सामने गिड़गिड़ाने नहीं जाता।

इसलिए नहीं कि वह ईश्वर के अस्तित्व को नकारता है। बल्कि इसलिए कि उसे कोई भय ही नहीं है। जिसे भय नहीं — वह माँगे क्या? जिसे कोई कमी नहीं दिखती — वह सुधरे क्या?

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बोध की कोई बाहरी परिभाषा नहीं है। कोई प्रमाणपत्र नहीं है। कोई गुरु नहीं है जो कहे — तुम्हें हो गया।

वह एक आंतरिक घटना है। जैसे नींद। जब तक नहीं आती — तुम जानते हो कि नहीं आई। जब आती है — तब तुम जानते नहीं। बस होती है।

बोध भी बस होता है।

और जब होता है —

तो सब कुछ वैसा ही रहता है।

लेकिन तुम नहीं रहते।