निर्भार

विस्तृत व्याख्या

निर्भार

वस्तुओं और विचारों के भार से मुक्ति

निर्भार अपने वजूद को पहचानने और महसूस करने की प्रक्रिया है।

01

पुतले का छलावा

कभी बाज़ार से गुज़रो तो किसी दुकान के उस खूबसूरत पुतले की तरफ देखना।

दुकानदार ने उसे वे कपड़े पहनाए होंगे जो अभी चलन में हैं। जो सबसे महँगे हैं। जो सबसे अच्छे हैं। तुम दो साल बाद फिर वहीं से गुज़रो। मान लो दुकानदार ने पुतले के कपड़े न बदले हों। वही कपड़े हैं, लेकिन अब उनका 'चलन' नहीं है।

क्या वह पुतला आज भी तुम्हें उतना ही सुंदर लग रहा है? या उस पुतले को उतार कर सबसे सस्ते, अजीब से कपड़े पहना दो। क्या वह पुतला अब भी सुंदर लगेगा? नहीं।

तो पुतला सुंदर था भी या नहीं? या सिर्फ कपड़े थे? अगर कपड़े ही सुंदर होते, तो जो एक बार सुंदर था, वह हमेशा सुंदर लगता। सच तो यह है कि न तुम्हें पुतला सुंदर लग रहा था, न उसके कपड़े। यह सिर्फ तुम्हारा नज़रिया था। जो तुम्हें किसी और ने दिया था。

एक तरह के कपड़े 1926 में सुंदर लगते थे, और 2026 में उसी तरह के कपड़े अच्छे नहीं लगते। यह सिर्फ नज़रिया है, कोई तथ्य नहीं।

अब अजंता की मूर्तियों को देखो। वे सुंदर हैं। जब देखो, सुंदर ही लगती हैं। इंद्रधनुष को देखो। वही सात रंग, वही आकार। हर बार वही। लेकिन हर बार सुंदर। हो सकता है किसी एक को इंद्रधनुष सुंदर न भी लगे। लेकिन तुम्हारे पास कोई विकल्प नहीं है। इंद्रधनुष तुम्हारे लिए नए-नए स्वांग नहीं रचेगा। वह जैसा है, वैसा है। यही उसकी व्यवस्था है।

02

ताकत का खेल

तो फिर इंसानों को इस 'नज़रिए' की कहानी की ज़रूरत क्यों पड़ी? क्या ज़रूरत पड़ गई किसी के जीवन को ढेर सारे कपड़ों और गैर-ज़रूरी सामानों से भरने की?

यह बाज़ारवाद है। ताकत का खेल।

अब लड़ाइयाँ मैदानों में बाहुबल से नहीं लड़ी जातीं। ताकत का प्रदर्शन पैसों से होता है। और प्यादों को लगता है कि नए-नए कपड़े खरीद कर वे अपनी 'ताकत' और 'रुतबा' का प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन असली खेल तो बाज़ार के मालिकों की ताकत का है।

सन् 1800 और 1900 के दशकों के गाँव के जीवन को देखो। कंपनियाँ कहती हैं — तब विकास नहीं हुआ था। सच यह है — तब बाज़ारवाद हावी नहीं हुआ था।

उन घरों में अनाज का भंडार सबसे बाहरी कमरे में होता था। जो सबसे ज़रूरी था — वह सबसे सामने था। बाज़ारवाद ने कहा — यह अच्छा नहीं दिखता। पहले कमरे में सुंदर-सुंदर बिना काम की चीज़ें अच्छी लगती हैं। किस मेहमान के मन में यह आया होगा कि पेट भरने वाला अनाज यहाँ अच्छा नहीं दिखता?

03

सुंदरता की परिभाषा

और अच्छे दिखने की परिभाषा क्या है? बहुत हुआ तो यह — चीज़ें गंदी न हों। टूटी-फूटी न हों। बस इतना। लेकिन बाज़ारवाद ने उसे भी "सौंदर्य" का नाम दे दिया। और सौंदर्य को पूरा करने का सामान बेच दिया।

"सुंदरता" को देखो। सुंदरता बहुत व्यक्तिगत राय है। हर किसी को अलग-अलग रूप में चीज़ें सुंदर लगती हैं। लेकिन बाज़ार ने सुंदरता को परिभाषाओं में बाँधा। वह परिभाषा आम जनता को सौंपी। और उसे पूरा करने का सामान बेचा।

तुम्हारे पास एक तरह के कपड़े हों, जो तुम्हें आरामदायक लगते हों, जो तुम्हारे शरीर के आकार से सामंजस्य बनाते हों, और जिनमें तुम जानते हो कि तुम खूबसूरत लगते हो। लेकिन बाज़ारवाद तुम पर 'विविधता' का तीर चलाता है। क्योंकि तुम्हारे एक ही कपड़े पहनने से उनकी ताकत नहीं बढ़ती। उनकी ताकत तुम्हारे लगातार खरीदते रहने पर निर्भर करती है।

वे एक ऐसे इंसान को उकसाते हैं जो अभी उन कपड़ों में बैठा है जिनमें वह सबसे ज़्यादा सहज है। वे कहते हैं— "मीटिंग में ये कपड़े पहन कर नहीं जाया जा सकता, उसके लिए अलग तरह के कपड़े लो। जो मीटिंग के लिए लोगे, उन्हें पहन कर शादी की दावत में नहीं जाया जा सकता। जो दावत के लिए लोगे, उन्हें पहन कर पिकनिक पर नहीं जाया जा सकता।"

और बाज़ार इसमें रोज़ नए प्रयोजन जोड़ता जाता है। लिस्ट बड़ी होती जाती है। और हर लिस्ट के साथ यह जानकारी भी मुफ़्त में दी जाती है — "एक ही जगह पर एक ही कपड़े को दोबारा पहनने वाला गरीब होता है।" इस लिस्ट को न मानने वाला गरीब होता है।

04

सम्मोहित भीड़

लोग कहते हैं — इंसान भेड़चाल चलता है। मैं कहता हूँ — भेड़ से भी गया-बीता है। सम्मोहित भेड़ जैसा है। भेड़ों का भी सबसे सुप्त रूप।

कुछ देर को ठहरो। तुम अपने दफ़्तर में लैपटॉप पर बैठ कर काम कर रहे हो, या किसी नए प्रोजेक्ट पर चर्चा कर रहे हो—इसका इस बात से क्या संबंध है कि तुमने इस्तरी की हुई फॉर्मल शर्ट, कड़क पैंट और ख़ास तरह के जूते ही पहने हों? उस चर्चा का उन कपड़ों से क्या संबंध है?

मान लो कि वे नहीं चाहते कि कपड़े अवांछनीय हों जिससे माहौल की गंभीरता भंग हो। तो यह स्पष्ट शब्दों में कहा जा सकता है। एक ही पैटर्न इसकी बाध्यता नहीं है। एक साधारण कुर्ता या साफ़ टी-शर्ट भी उतनी ही शोभनीय है।

बाज़ारवाद तुम्हें कहानियों में उलझाए रखता है ताकि तुम्हारी खरीददारी जारी रहे। निरंतर रहे। वरना अगर इंसान अपनी ज़रूरत की चीज़ें लेकर रुक गया, तो बाज़ार ज़्यादातर खाली रहेंगे। और इससे बाज़ार चलाने वालों की ताकत नहीं बढ़ पाएगी। वे तुम्हारी अलमारी को, तुम्हारे घर को सामान से भरते हैं और फिर थोड़े दिन बाद कह देते हैं— "वह सामान बेकार हुआ, अब नए सामान से भरो।"

05

विविधता का बोझ

और कुछ देर के लिए इसमें से पैसे का पक्ष बाहर रख भी दें... तो इस झूठी 'विविधता' को बनाए रखने के लिए कितने विकल्प सोचना, उन्हें ढूँढने घंटों बाज़ार में घूमना, भ्रमित मन से उसे लेकर आना, और फिर लोगों की प्रतिक्रिया के लिए उनका मुँह ताकना। और फिर किसी की व्यक्तिगत राय पर अपने इस पूरे श्रम का आकलन करना। यह हर दिन तुम्हारे दिमाग पर कितना भारी बोझ है?

क्या हो, यदि तुम खुद को इस कहानी से मुक्त कर लो? तुम बस वह चीज़ें लेते हो जो तुम्हारी ज़रूरत की हैं, और उन्हें तब तक इस्तेमाल करते हो जब तक वे काम कर रही हैं।

सोचो, तुम्हारे घर से कितना बोझ बाहर होगा? तुम्हारे मन से उन चीज़ों को लाने और सहेजने का कितना बोझ बाहर होगा? उन चीज़ों को खरीदने के लिए पैसे कमाने की मजबूरी का कितना बोझ बाहर होगा? और जब तुम इस विविधता की अंधी दौड़ में होगे ही नहीं, तो "आज मैं कैसा लग रहा हूँ" इसका कितना बोझ बाहर होगा? क्योंकि तुमने जो पहना है, वह वही है जिसमें तुम अच्छे लगते हो। तो आज भी अच्छे ही लग रहे होगे।

सिर्फ एक बोझ रह जाता है— सामाजिक नज़रिए का। उस बोझ से तुम्हें स्वयं को मुक्त करना होगा। क्योंकि वह दूसरों के विचारों पर निर्भर करता है। तुम्हारा बॉस तुम्हें एक तरह के कपड़ों में पसंद करता है, तुम बाज़ार से वैसे 4 कपड़े ले आते हो। फिर तुम्हारा दोस्त कहता है, "यह तुझ पर नहीं जम रहा।" तुम दोस्त की पसंद के 4 कपड़े और लाते हो। और इसका बोझ तुम स्वयं उठाते हो। बॉस या दोस्त नहीं।

यह भ्रम कितना मिथ्या है, यह जानना हो तो एक दिन एक निश्चित राशि लेकर किसी कपड़े की दुकान में जाओ। जो तुम्हारा बजट हो। और दुकानदार से कह दो— "अपने हिसाब से इतने पैसों में मेरे लायक कोई भी अच्छा कपड़ा दे दो।" उसे पहनो और किसी पार्टी में चले जाओ। देखो कैसी प्रतिक्रिया मिलती है। तुम पाओगे कि जितना दिमाग लगाकर तुम कपड़ों का चयन करते थे, वह सब व्यर्थ था। सारा भ्रम बाज़ार के अंदर होता है। बाज़ार के बाहर बस एक ही चीज़ काम करती है— जो तुमने पहना है, वह तुम पर विचित्र तो नहीं लग रहा। बस इतना ही।

06

पुतले से अजंता की मूर्ति तक

सारे पैटर्न, सारे रंग बस तुम्हें बाँधे रखने वाली कहानियाँ हैं, जो तुम्हें महसूस कराती हैं कि तुमने आज कुछ 'हासिल' किया है। वास्तविकता में तुम बस कपड़ों के ढेर में से कोई एक कपड़ा उठाकर लाते हो। यही होता है तुम्हारे घर में भरे हर सामान के साथ। तुम्हारे पास वे चीज़ें होती हैं जो विज्ञापनों और लोगों की देखा-देखी घोषित हुई हैं कि 'जीवन के लिए ज़रूरी हैं'। उन्हें पाना और बनाए रखना तुम्हें एक अंधी दौड़ में बनाए रखता है。

ज़रा सोचो, कितनी ही बारिशें, कितनी ही ठंडी हवा के झोंके, कितनी ही खिली धूप, कितने ही नज़ारे तुमने नज़रंदाज़ कर दिए क्योंकि तुम भाग कर जा रहे थे उन चीज़ों को खरीदने के लिए पैसे कमाने... जो कहानी ने तुम्हें बताया कि ज़रूरी हैं, सुंदर हैं, जो तुम्हारा मूल्य दर्शाती हैं, तुम्हारी 'औकात' बताती हैं। तुम उस दुकान का पुतला बन गए। बदलते कपड़ों में इतने खो गए कि 'अजंता की मूर्ति' बनने का कभी ख्याल ही नहीं किया। जिसकी पहचान उसके कपड़ों से नहीं, उसके खुद से हो। जिस पर कोई भी कपड़ा डाल दो, जिसे कोई भी बैग पकड़ा दो, जिसे कोई भी जूते पहना दो, जिसे कोई भी गैजेट्स दे दो, कोई भी गाड़ी दे दो... उसका महत्व न कम किया जा सकता है, न ज़्यादा। वह जो है, अपने वजूद से है। किसी के सुझाव या प्रतिक्रिया से नहीं।

और यह सिर्फ सामान का बोझ नहीं है। जानकारी का बोझ भी है। समाचार चैनल तुम्हें दुनिया की जानकारी नहीं देते। मनोरंजन देते हैं। जानकारी सुनकर तो तुम काम पर चले जाओगे। उन्हें चाहिए कि उसी एक जानकारी को तुम सुनते रहो — और उनके नए विज्ञापन देखो। किसी ने किसी की हत्या की — यह जानकारी बहुत कम देर की होती है। लेकिन किसने की। किस धर्म का था। किस धर्म वाले की की। सही किया या गलत किया — यह समाचार नहीं है। यह तुम्हें एक दिशा देने का षड्यंत्र है।

सुंदरता की हर परिभाषा तुम्हारे जीवन को जटिल बनाती है। और तुम्हें छोटा महसूस कराती है। बाज़ारवाद ने वह वक्त कभी नहीं आने दिया जहाँ किसी को यह लग पाए — मेरे पास ज़रूरत की हर चीज़ है। क्योंकि बाज़ार रोज़ एक नई चीज़ को ज़रूरत घोषित करता है।

हिम्मत करके, बाज़ार की आँखों में आँखें डाल कर हर गैर-ज़रूरी सामान को बाहर फेंक देने और सिर्फ अपनी ज़रूरत की चीज़ें साथ रखने की शपथ ही 'निर्भार' है। जहाँ तुम पलंग तो लेते हो क्योंकि वह आरामदायक है, उसके गद्दे में तुम्हारी दिलचस्पी है। लेकिन उसके डिज़ाइन और हेडबोर्ड में तुम्हारी कोई दिलचस्पी नहीं है। क्योंकि डिज़ाइन कहानी है। गद्दा ज़रूरत है।

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